हाईकोर्ट ने भी माना कि देश में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है

दिल्ली हाईकोर्ट ने देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) की आवश्यकता का समर्थन किया है और केंद्र सरकार से इस मामले में आवश्यक कदम उठाने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि आधुनिक भारतीय समाज धीरे-धीरे 'सजातीय' हो रहा है; धर्म, समुदाय और जाति की पारंपरिक बाधाएं खत्म हो रही हैं और इन बदलावों के मद्देनजर समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है।

हाईकोर्ट ने भी माना कि देश में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है
दिल्ली हाईकोर्ट ने देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) की आवश्यकता का समर्थन किया है और केंद्र सरकार से इस मामले में आवश्यक कदम उठाने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि आधुनिक भारतीय समाज धीरे-धीरे 'सजातीय' हो रहा है; धर्म, समुदाय और जाति की पारंपरिक बाधाएं खत्म हो रही हैं और इन बदलावों के मद्देनजर समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है।
 
समान नागरिक संहिता क्या है?
 
समान नागरिक संहिता अथवा समान आचार संहिता का अर्थ एक धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) कानून होता है जो सभी धर्म के लोगों के लिए समान रूप से लागू होता है! दूसरे शब्दों में, अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग सिविल कानून न होना ही ‘समान नागरिक संहिता’ की मूल भावना है! यह किसी भी धर्म या जाति के सभी निजी कानूनों से ऊपर होता है! देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून! यानी, ये एक तरह का निष्‍पक्ष कानून होगा! जब ये कानून बन जाएगा तो हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी को एक ही कानून का पालन करना होगा! यानी, मुस्लिम चार शादियां भी नहीं कर सकेंगे!
 
दुर्भाग्यवश अधिकांश लोगों को इसकी चेतना नहीं। हालिया समय में संविधान के अनुच्छेद 25 से 31 की हिंदू-विरोधी व्याख्या स्थापित कर दी गई है। कई शैक्षिक, सांस्कृतिक, सामाजिक अधिकारों पर केवल गैर-हिंदुओं यानी अल्पसंख्यकों का एकाधिकार बना दिया गया है।
 
सरकार हिंदू शिक्षा संस्थानों और मंदिरों पर मनचाहा हस्तक्षेप करती है और अपनी शर्तें लादती है। वह ऐसा गैर-हिंदू संस्थाओं पर नहीं करती। इसी तरह अल्पसंख्यकों को संवैधानिक उपचार पाने का दोहरा अधिकार है, जो हिंदुओं को नहीं है। हिंदू केवल नागरिक रूप में न्यायालय से कुछ मांग सकते हैं, जबकि अन्य, नागरिक और अल्पसंख्यक, दोनों रूपों में संवैधानिक अधिकार रखते हैं। ऐसा अंधेर दुनिया के किसी लोकतंत्र में नहीं कि अल्पसंख्यक को ऐसे विशेषाधिकार हों जो बहुसंख्यक को न मिलें। यह हमारे संविधान निर्माताओं की कल्पना न थी।
 
1970 के आसपास कांग्रेस-कम्युनिस्ट दुरभिसंधि और हिंदू संगठनों के निद्रामग्न होने से संविधान के अनुच्छेद 25 से 31 को मनमाना अर्थ दिया जाने लगा। संविधान की उद्देशिका में जबरन "सेक्युलर" शब्द जोड़ने से लेकर दिनों-दिन विविध अल्पसंख्यक संस्थान, आयोग, मंत्रालय आदि बना-बना कर अधिकाधिक सरकारी संसाधन मोड़ने जैसे अन्यायपूर्ण कार्य होते गए। विडंबना यह कि इनमें कुछ कार्य स्वयं हिंदूवादी कहलानेवाले नेताओं ने किए। वे केवल सत्ता कार्यालय, भवन, कुर्सी आदि की चाह में रहे।
 
हिंदुओं को दूसरों के समान संवैधानिक अधिकार दिलाने की लड़ाई जरूरी है। इसमें दूसरे का कुछ नहीं छिनेगा। केवल हिंदुओं को भी वह मिलेगा, जो मुसलमानों, ईसाइयों को हासिल है। "संविधान दिवस" मनाने की अपील तो ठीक है, लेकिन यह समझा जाना चाहिए कि संविधान के अनुच्छेद 25 से 31 को देश के सभी नागरिकों के लिए समान रूप से लागू करना आवश्यक है। यह न केवल संविधान की मूल भावना के अनुरूप, बल्कि सहज न्याय है। हिंदुओं के हित की कुंजी अन्य धर्मावलंबियों जैसे समान अधिकार में है। स्वतंत्र भारत में हिंदू समाज का मान-सम्मान, क्षेत्र संकुचित होता गया है और यह प्रक्रिया चालू है।
 
भारत देश में मुस्लिमों के लिए अलग कानून है, हिन्दुओं के लिए अलग, ईसाईयों के लिए अलग कानून है। फिर देश में शांति और समन्वय कैसे कायम रह सकता है, जब अलग-अलग धर्म के लोग अपने अधिकारों में अंतर पाएंगे? ये तो देश की एकता के लिए भी खतरा है।
 
उदाहरण के लिए, मुस्लिम एक समय में 4 शादी कर सकता है पर दूसरे धर्मों के लोग केवल एक, ऐसा क्यों? मेहर कानूनी रूप से वैध है, दहेज कानूनी रूप से अवैध है, ईसाइयों में Gift के नाम पर सब चलता है, ऐसा क्यों? ये सभी कानूनन अवैध क्यों नहीं? हिन्दू मंदिरों की सम्पत्ति सरकार कानून बनाकर ले लेती है पर दूसरे धर्मों के स्थलों पर सरकार अपना हक कभी पेश नहीं करती। दूसरे धर्मवाले मदरसों, कॉन्वेंट स्कूलों में अपने धर्म की शिक्षा दे सकते है पर हिन्दू अपनी स्कूलों में अपने धर्म की शिक्षा नहीं दे सकते, ऐसा क्यों?
 
यही कारण है कि देश में लोगों के बीच भेदभाव बढ़ रहा है, लोगों में असंतोष बढ़ रहा है जो लोकतंत्र में किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं।
 
सबसे ज्यादा अन्याय अगर इस भिन्नता के कारण किसी के साथ हो रहा है तो वो है हिंदुओं के साथ। अल्पसंख्यक लोगों को धर्म के नाम पर विशेष छूट दी जाती है, लेकिन हिंदुओं के साथ सदैव अन्याय होता है। अगर हिन्दू अपनी धर्म के प्रति निष्ठा जाहिर करे तो उसे कट्टरता का नाम देते हैं, जबकि दूसरे धर्मवालों को धर्मनिष्ठ कहते हैं। यदि दो गुटों के बीच बहस हो रही हो तो सदैव हिन्दू को दोषी ठहराया जाता है। यहीं से आप समझ सकते हैं कि कानून में भिन्नता के कारण भी हिंदुओं के साथ कितना अन्याय हो रहा है।
 
जब चीन में Uniform Civil Code लागू हो सकता है तो भारत मे क्यों नहीं ? भारत में Uniform Civil Code को मौलिक अधिकार बनाने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने और उचित कानून बनाने की आवश्यकता है।