बाढ़ का सैलाव या राजनीति की बाढ़ तूफानी नदियों की बाढ़ से त्रस्त बिहार

इस साल बरसात के शुरुआती दौर में ही मानसून के छा जाने से मिथिलांचल के साथ-साथ अन्य कई क्षेत्रों में बाढ़ से नुकसान का सिलसिला चल पड़ा हैं। गरीब-गुरबों और किसानों के लिए जहां बाढ़ का मतलब जान-माल और फसल की भारी तबाही होती हैं।

बाढ़ का सैलाव या राजनीति की बाढ़ तूफानी नदियों की बाढ़ से त्रस्त बिहार

इस साल बरसात के शुरुआती दौर में ही मानसून के छा जाने से मिथिलांचल के साथ-साथ अन्य कई क्षेत्रों में बाढ़ से नुकसान का सिलसिला चल पड़ा हैं। गरीब-गुरबों और किसानों के लिए जहां बाढ़ का मतलब जान-माल और फसल की भारी तबाही होती हैं। वहीं मंत्रियों के लिए हवाई सर्वेक्षण तथा अधिकारियों के लिए राहत सामग्रियों की आपूर्ति के नाम पर भयानक लूट।वहीं विपक्षी पार्टियों के लिए इसका मतलब नए-नए राजनीतिक समीकरणों और जोड़-तोड़ का एक मौका होता हैं। जैसा कि जयनगर कमला बलान पर बाढ़ का पानी अंतिम निशानी पर आ जाने से बाढ़ की राजनीति पैदा कर दी हैं।इस साल बिहार के बीस जिलों के बीस लाख से अधिक लोग बाढ़ से पीड़ित हैं।

बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा हैं, ऐसा सरकारें कहती हैं।पर लोग इसे सरकारी आपदा कहते हैं। उत्तर बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाके खासकर मधुबनी,दरभंगा,समस्तीपुर जिला आज़ादी मिलने के बाद तकरीबन पच्चीस बार प्रलयकारी बाढ़ का प्रकोप झेल चुके हैं।इस बार फिर नदियों में भयंकर बाढ़ आ गई हैं। हाल में नेपाल द्वारा कोसी बैराज से लगभग 70 हजार क्यूसेक से अधिक पानी छोड़े जाने से कोसी का जल स्तर बहुत अधिक बढ़ गया। नेपाल से निकलने वाली बूढ़ी गंडक,बागमती और अधवारा समूह की नदियां भी तूफान पर हैं। कमला बलान तो अपने चरम सीमा से बाहर हैं। इसके कारण सैकडों गांवो में बाढ़ का पानी फैल गया हैं।

नेपाल से निकलने वाली सारी नदियां बिहार के मधुबनी जिला के झंझारपुर, घोघरडीहा,अंधराठाढ़ी,फुलपरास, बाबूबरही,बेनीपट्टी, बिस्फी,राजनगर और दरभंगा जिला के हायाघाट,बिरौल,घनश्यामपुर,कुशेश्वर स्थान,अरई बृद्धिपूर,सिमरी,चमनपुर में बाढ़ से भारी तबाही मचाई हैं। बागमती नदी में अचानक पानी में लगातार ठहराव रहने के बाद फिर से जल स्तर में काफी इजाफा हो गया हैं। इससे अत्यधिक बाढ़ आने से शहर वासी संशकित हैं। जयनगर स्थित कमला नदी का जल स्तर में अचानक उछाल आया गई। कमला में आई भीषण बाढ़ की वजह से अधिक जगहों पर कमला का तटबंध टूटा हुआ अवस्थित में हैं। जिससे दर्जनों गांवों में तबाही का मंजर देखने को मिलता हैं।लेकिन सरकार द्वारा बाढ़ से बचाव का कोई सार्थक प्रयास शुरू नहीं हुआ। इन क्षेत्रों में एक बड़ी चुनौती यह हैं कि दर्जनों सड़के एवं पल आवागमन के लिए पूरी तरह ठप हैं। बाढ़ की वजह से मोबाइल फ़ोन का टॉवर भी ठीक से काम नहीं कर रहा हैं। मुख्य सड़क से पैदल रास्ते बन्द होने की वजह से ग्रामीण दाने-दाने के लिए मोहताज हैं।

बाढ़ से प्रभावित इस क्षेत्र के निजात के लिए बाढ़ नियंत्रण के नाम पर देश के केंद्रीय जल आयोग जैसी भारी-भरकम संस्था का गठन किया गया।बाद में गंगा,सिंधु और ब्रहम पुत्र आयोगों को भी गठित किया गया।सन 1957 में इन आयोगों की रिपोर्ट आने के बाद डॉ. राधा कृष्णन के नेतृत्व में एक दल ने बाढ़ नियंत्रण के अध्ययन के लिए चीन की यात्रा की।वहां से लौटकर  इस दल ने नदियों के उदगम स्थल  पर बड़े-बड़े बांधों के जरिए जलाशय निर्मित कर पानी के बहाव को नियंत्रित करने तथा सिचाई व जल-विधुत उत्पादित करने के लिहाज से इन जलाशयों का उपयोग करने की महत्वाकांक्षी जलकुंडी योजना बनाई।नेपाल सरकार, भारत सरकार और उत्तरप्रदेश सरकार के पिछले शासन ने अपने हिस्से के 33 करोड़ रुपये देने से इंकार कर दिया और योजना खटाई में पड़ गई। राष्ट्रीय स्तर पर तत्कालीन केंद्रीय योजना और सिचाई मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने 03 सितंबर 1954 को लोकसभा में बाढ़ जनित समस्याओं और इसके निदान के स्वरूप पर एक वक़्तव्य दिया।जिसे बाढ़ नीति संबंधी स्वतंत्र भारत का पहला वक़्तव्य विभाजित हुआ।

1954 में बाढ़ संबंधी एक नीति निर्धारण के अतिरिक्त समय-समय पर केन्द्रीय सरकार द्वारा बाढ़ का सामना करने के लिए अलग-अलग समितियां,कार्यकारी दल तथा आयोग आदि नियुक्त किए जाते रहें। इन समितियों ने बाढ़ संबंधी विभिन्न आयामों का विस्तृत अध्ययन किया।जिसमें बाढ़ का पूर्वानुमान,बाढ़ से पूर्व चेतावनी,बाढ़ क्षेत्र प्रबंधन,बाढ़ से मुकाबला बचाव राहत कार्य तथा राहत कार्यो का प्रबंधन आदि शामिल हैं और इसके अनुरूप उन्होंने अपनी सिफारिशे भी दी।

1964 में यह आवाज़ उठी थी कि बागमती परियोजना के लिए आवंटित रूपयों को राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में जमा कर दिया जाय ता कि वह देश के बेहत्तर कार्य में काम आए। लेकिन वह ठेकेदारों,अभियंताओं,,पदाधिकारियों एवं जन प्रतिनिधियों की जेबों की शोभा बन गए और बागमती परियोजना आजतक अभिशाप बन कर रह गई। बाढ़ को नियंत्रित करने के लिए प्रदेशों की सरकारों ने नदियों के किनारे तटबंध बनाने का रास्ता अपना लिया।देखते-देखते कुकुरमुत्ते की तरह तटबंध उग आए।बिना किसी सभान्वित योजना व केंद्रीय देखरेख के कई प्रभावकारी नेता ने शाही अंदाज में तटबंध का निर्माण कराया। वेटेड पैरामीटर का कोई ख्याल नहीं रखा गया।भ्रष्ट सांसद,विधायक और मंत्री अपने चट्टे-बट्टे के साथ सरकारी धन को लूटने में मशगूल रहें। परंतु बाद के दिनों में तो तटबंधों की देख-रेख भी बन्द हो गई।

इसी बीच जयनगर मुख्यालय से मात्र 6 किलोमोटर उत्तर नेपाल में पूर्व पश्चिम हुलाकी राजमार्ग अंतर्गत धनुषा और सिरहा जिला को जोड़ने वाली बंदीपुर के नजदीक पांच सौ मीटर लंबी कमला नदी का नया पुल उदघाटन की अंतिम तैयारी से पहले ही क्षतिग्रस्त हो गया। या यूं कहें तो यह पुल बेलगाम अफसरों एवं बेईमान ठीकेदारों के कारण भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई।

बिहार की बाढ़ के लिए नेपाल ही नहीं,बल्कि हमारें सरकारी अधिकारियों की रणनीतियां भी जिम्मेवार हैं। साथ ही इसकी जिम्मेवारी राजनीतिक,आर्थिक और मनोवैज्ञानिक भी हैं। चूकि बाढ़ और सुखाड़ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसलिए इन दोनों का समाधान जल का सामुदायिक जल संबंधन से ही सम्भव हैं।